ग़ुस्सा
कभी कभी यूं ही मुझसे ग़ुस्सा आ जाता है
सवेरे सवेरे पंछी गाते हैं
और मुझे ग़ुस्सा आ जाता है।
सुरज की किरणें मेरी आंखों मे समाती है
और मुझे ग़ुस्सा आ जाता है।
किसी ने मेरे दिल की शांति भंग नही की
किसी ने मेरे कान मे आकर अपना दुखडा नही रोया
किसी राजनीतिज्ञ से भी नही मिला
ना ही किसी भिक्षुक की दयनीय हालत देखी।
यूं ही, बस यूं ही मुझे कभी कभी ग़ुस्सा आ जाता है।
कहते हैं ग़ुस्सा इन्सान को खा जाता है
परंतु मेरी चेतना कभी ख़त्म नही हो पायी
क्या अब ग़ुस्सा भी बेईमान हो गया है?
क्या अब ग़ुस्सा भी इन्सान हो गया है?
हद्द है! मुझे इस बात का भी ग़ुस्सा है
कि मुझे ग़ुस्सा क्यों आता है?
मूझे इस बात का भी ग़ुस्सा है
कि मैं जिंदा ही क्यों हूँ?
तुम उदास होते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।
तुम हँसते-गाते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।
तुम बक बक करते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।
तुम चुप चुप रहते हो, मुझे ग़ुस्सा आता है।
हे ग़ुस्से!
निकल लो, नहीं तो बहुत पछताओगे
मेरे ग़ुस्से की आग मे भस्म हो जाओगे।

3 टिप्पणियाँ:
विकास जी आप का गुस्सा देख कर हम भी गुस्से से टिप्पणी कर रहे हैं:(महात्मा गाँधी जी के अनुसार जब काम सताए तो ठंड़े पानी से नहाएं..आप को गुस्सा आ रहा है आप भी ठंडे पानी से नहाए:(आप की रचना गुस्से मे भी अच्छी लिखी गै है:(
आप की रचना गुस्से मे भी अच्छी लिखी गई है:(
बहुत कम के पास ऐसा गुस्सा होता है। सब ठीक है पर इसके सकारात्मक उपयोग की जरुरत है।
गुस्से का यह अनोखा इजहार पसन्द आया। बधाई।
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