22 August, 2007

वक्त : मेरे एक मित्र की कविता

यह कविता मेरे एक मित्र विपिन के द्वारा लिखी गयी है. आशा है कि आपसब उनका उत्साहवर्धन करेंगे. वह अभी अंग्रेजी में ही ब्लोगिंग करते हैं. लिंक यह रहा : http://halfcigarette.blogspot.com

सुना था
कि वक्त हर मर्ज की दवा है
हर घाव को भर देता है
हर चेहरे को मिटा देता है

फिर क्यूँ - क्यूँ अभी तक
मेरी स्लेट पर तुम्हारा नाम बाकी है.

हर नया नाम
'रेत' से लिख पाता हूँ.
हर नया चेहरा
पानी में उंगलियों से बनाता हूँ.

बस इक नाम
ना जाने कब कुरेद लिया मैंने
कि चाहकर, चाहकर भी उसे मिटा नहीं पाता.

2 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली said...

कविता में भीतर का एहसास उभर कर सामने आ गया।बढिया रचना है।

divas!!! said...

ye naam nahi ek ehsaas hai
uske hone ka
uske pyaar ka
aur chah kar be ye mit nahi sakta....

sundar kavita hai par kuch aduri se lagi.. shayed is ke adurepan mein be kaye sandesh chupe hai ...


khush rahe ...
sneh ke saath
hema

"Magical Template" designed by Blogger Buster