12 August, 2007

मैं दुःखी हूँ!

IIT मे आत्महत्या होती है तो मिडिया को तो पता नही क्या हो जाता है। पिछली घटना के बाद, बहुत सारे लोगों ने बहुत शोर मचाया और संस्थान ने इन्टरनेट को इसका कारण घोषित करके हमारे इन्टरनेट के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया। शोर शराबा थम गया। छात्र चिल्लाते रहे कि इन्टरनेट इसका कारण नही है, हो भी नही सकता। लेकिन नक्कारखाने मे तूती की आवाज कौन सुने?

अभी कल फिर एक ऐसी ही दुखद घटना हो ही गयी। समाचार यहां देखें

अब सवाल ये उठता है कि क्या इससे यह साबित नहीं होता कि IIT के छात्र भी इन्सान हैं। और यह आवश्यक नही कि उनके हर कदम के पीछे संस्थान की नीतियाँ या संस्थान ही जिम्मेदार है. आख़िर निजी जिंदगी भी एक चीज है. फिर मीडिया ऐसी हर घटना को तूल क्यों देता है? संस्थान ऐसी घटनाओं के बाद छात्रों पे नयी नयी नीतियों का बोझ क्यों डालता है?

मैं दुःखी हूँ!
क्यों?
ये नही जानता!

1 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

सत्य वचन-IIT के छात्र भी इन्सान ही होते हैं. मगर देश और समाज के सबसे तेज और फर्टाईल ब्रेन माने जाने वाले इन युवाओं से (जो यह एन्ट्रेन्स के कठिन परीक्षा को पास करके प्रूव कर चुके होते हैं)समाज और देश को बहुत उम्मीदें रहती हैं और इसी लिये इस तरह की बातों से धक्का पहुँचता है.

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