विकास की कहानी
मेरी एक कविता की टिपण्णी पर अनिल जी ने एक बहुत ही बढ़िया लेख का लिंक दिया है। उसे पढ़कर मुझे अपने गाँव मे हुई एक बातचीत याद आ गयी। वह मैं आप सबों के साथ बाँटना चाहता हूँ।
मेरे गाँव के कुछ लोग अमरीका मे रहते हैं। किसी परिवार वाले की शादी के समय जब वो यहां भारत अपने गाँव लौटे तो पाया कि अभी भी हालत जस की तस है। वे बहुत अमीर लोग नही थे, जो मिलियन डालर डोनेट कर दें। परंतु उन्होने अपने सामर्थ्य के अनुसार मदद करने की ठानी। गाँव के कुछ लोगों को बुलाया और बातों का सिलसिला चल निकला। उन्होने कहा कि गाँव मे बहुत गंदगी है, नाली का पानी जमा हो जाता है, पीने के पानी की समस्याएं हैं तो मैं अपने पास से कुछ पैसे खर्च कर के गाँव की नालियाँ ठीक करवाना चाहता हूँ और एक दो चापाकल लगवा देता हूँ। उनका यह प्रस्ताव गाँव के बडे बुजुर्गो ने सुना। बडे ही ध्यान से सुना। और थोड़े से विचार विमर्श के बाद सब लोग एकमत हो गए।
जी हाँ! एकमत से सबने इस प्रस्ताव से इनकार कर दिया। बोले, "देखिए! अब आपको तो यहां रहना है नही, तो काहे बेकार मे ई नाली वाली के पीछे पडे हैं? हमलोगों का ऐसा ही आदत है। आउ इससे जादे फरको नहीं पड़ता है। तनी सा गोरे ना गन्दा होता है। उससे कोई दिक्कत नही है। हमारे पास इससे बड़ा समस्या है। आपको अगर कुछ करना है त वही प्रोबलेमवा सुल्झायिये!"
बिचारे विदेश से आये महानुभाव तनिक सपके। उन्हें लगा कि अमरीका मे रहते रहते उनकी बुद्धि कुंद हो गयी है है जो बड़ी समस्याओं को नही देख पा रही। सो थोड़ी उत्सुकता मे भर कर बोले, 'अजी कहिये ना! अगर मेरे वश मे होगा तो मैं जरूर मदद करूंगा।"
"देखिए! हमारे गाँव का जो मंदिर है ना...उसका बड़ा नाम है। अगल बगल के गांवों से भी लोग मंगलवार को कीर्तन के लिए आते हैं। आउ हूआं का ढोलक तनी सा खराब है। और हरमोनियमओं पुरान हो गया है। त उसी के लिए जरी मनी पैसा दे दीजिए।"
बेचारे टू-बी-सुधारक चुपचाप अपने पर्स से पैसे निकालने लगे। मगर उनके चहरे का असंतोष मुझसे नही छिप पाया। इस तरह की दो तीन और घटनाएं हैं, कभी वक्त मिला तो बताऊंगा। अभी चलता हूँ, कीर्तन करने। ;)

2 टिप्पणियाँ:
samajik katakshep kitni behtareen tareekey se kartey hain aap. Is kahani ne mukh par muskaan laa di :P
अब यह तो हाल है. क्या विकास की बात की जाये??
इसी मुद्दे पर मेरी अगली पोस्ट तय रही. :)
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