08 August, 2007

किसने कहा कि विकास नही?

उस दिन मैं जब रेलवे प्लेटफार्म पर
अपने पिताजी के साथ बैठा था
तो देखा -
जैसे ही एक ट्रेन रुकी,
बहुत सारे बच्चे उसमे घुस पडे
खाने के उन बचे हुए टुकड़ों को उठाने
जो यात्रिगण छोड़ गए थे -
चार लड़कों ने मिलकर
हमारे सामने ही एक पूरी पुड़ी खायी।

पिताजी ने मेरी ओर देखा
और आंखों मे तनिक वेदना भरकर बोले,
'देख विकास! इस देश का विकास ऐसे हो रहा है'

थोड़ी देर मे
दो कुत्ते आये
और जो थोड़े टुकड़े बच्चों ने
फर्श पर बिखेर दिए थे -
उनपर अपना मुहँ मारने लगे।

दूर से एक 'पागल' औरत ने यह देखा
(पागल ही तो थी!
अधनंगी होकर और कौन चल सकती है?
गरीबी भी तो पागलपन की ही एक किस्म है)
आते ही उसने कुत्तों को भगाया
और वह पौलिथिन उठा ली
एक पुड़ी का शतांश तो अब भी शेष था।
चुन चुन के उसे खाने लगी
और फिर दौड़ चली वहाँ -
जहाँ दो-तीन कुत्ते लड़ रहे थे।

इस बार मैंने पिताजी की ओर देखा
संवाद को शब्दों की आवश्यकता ना हुई।

जब मैं सोचने बैठता हूँ
तो भूत पर अचरज होता है
विकास के बाद भी ऐसा...?

अखबारों के पन्ने तो रुपये की मजबूती दिखाते हैं
और कहीँ अखबार कि रद्दी बेचकर लोग रुपये कमाते हैं।

जो मैंने देखा,
मुझे उसपर कोई विश्वास नही।
किसने कहा कि विकास नही?

थोडा ही सही,
लेकिन गरीब पूड़ी तो खाता है।
कुत्ते मारने के बाद ही सही
लेकिन मेहनत का फल तो मिल जाता है।
कचरे चुनने वाले
अब हाय क्लास पोलिमर चुनते हैं.
कीचड मे सोने वाले लोग
पक्के प्लेटफार्म पर सोते हैं.

आम जनता की ऐसी उन्नति पर किसे विश्वास नही?
किसने कहा कि विकास नही?

मेरे जैसे पागल तो
व्यर्थ ही बात का बतंगड़ बनाते हैं।
नही तो, किस देश के बच्चे
१० साल की उम्र मे पैसे कमाते हैं?

13 टिप्पणियाँ:

Shastri JC Philip said...

"चुन चुन के उसे खाने लगी
और फिर दौड़ चली वहाँ -
जहाँ दो-तीन कुत्ते लड़ रहे थे।"

बहुत मार्मिक विवरण है -- शास्त्री जे सी फिलिप

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

परमजीत बाली said...

बह्त सुन्दर लिखा है-

मेरे जैसे पागल तो
व्यर्थ ही बात का बतंगड़ बनाते हैं।
नही तो, किस देश के बच्चे
१० साल की उम्र मे पैसे कमाते हैं?

अनिल रघुराज said...

विकास की अच्छी कविता है। अब विकास का गद्य भी देखिए...
http://diaryofanindian.blogspot.com/2007/08/blog-post_660.html

Udan Tashtari said...

ह्म्म्म!! मार्मिक!

vipin kumar said...

din pratidin tumhari kavitao ki quality badhti hi jaa rahi hai ..iss kavita ne kaafi sundarta se marm aur kataksh ko ek sutra mein piro diya ...vastutah behtareen rachna hai.

tanha kavi said...

मेरे जैसे पागल तो
व्यर्थ ही बात का बतंगड़ बनाते हैं।
नही तो, किस देश के बच्चे
१० साल की उम्र मे पैसे कमाते हैं?

kavita ka maarmik ant kiya hai apne. yah samaaj ka nanga sach hai.
kay kahoon. bas apni kalam chalate rahein. shayad kisi ko to yah maarmik aur nagna sach jhakhjor sagega.

Manish said...

कविता का अंतिम पैरा जबरदस्त है ! सोचने पर विवश करता है...

Mired Mirage said...

बहुत मार्मिक!
घुघूती बासूती

mamta said...

विकास आपकी कविता मार्मिक होने के साथ -साथ सोचने को भी मजबूर करती है ।

Yatish Jain said...

"गरीबी भी तो पागलपन की ही एक किस्म है"
बहुत खूब
www.yatishjain.com

विकास कुमार said...

जब लिखा तो बिल्कुल आशा नही थी कि इस दर्जे का प्रोत्साहन मिलेगा। किस भांति आप सबों का आभार प्रकट करूं? बस अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें।

Seema Kumar said...

बहुत मार्मिक रचना है । सोचने पर मजबूर करती है ।

- सीमा

Nayi Subah said...

Oh Vikaaaaaaaas...........
Bahut hi badhiyaaaaaaaa
Seedhe Dil ko chhu gayi tumhari rachna..
tumhari lines...
थोडा ही सही,
लेकिन गरीब पूड़ी तो खाता है।

bahut der tak kachot ti rahi..............
sach me bahut achha likha...
sach maayne me yahi sachi kavita hai..
Prem -virah- prakriti etc...ab hame in sab se uth kar samaaj ke prati jagruk hona chahiye our apni samaajik vishamtao or vivashtao ko apni rachnao ke dwara prastut kerna chahiye..
tumhari bahut si kavitaye aisa kerti aayi hai..
aur sach mano unhe padh kar bahut khushi hoti hai..
tum sach me ek achhe lekhak aur insaan hi nahi ek achhe nagrik bhi ho.. aisa mai nahi tumhari kavitaye kehati hai!

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