03 August, 2007

ये तेरा मुस्काना, मेरी जान ना ले ले !

ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले
युगों se जिसे बचाया
वो ईमान ना ले ले
ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले

दिल खोल के जो हँसती हो
क्या जाने क्या करती हो
आंखो के रस्ते सीधे
दिल मे ही जा धंसती हो

दिल मे यूं बस जाना
मेरी जान ना ले ले।
ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले।


रोज सुबह जब सूरज,
तुझसे नैन मिलाये
आग तेरे अन्दर की
उसको भी झुल्साये!

कातिल ये तेरे नैन
मेरे सारे सुख चैन
अब छीनते हैं दिन रैन।
हुआ परेशान ! ओ मेरी जान!
जरा दे मुझपे थोडा ध्यान।

ये तेरा नैन उठाना,
मेरी जान ना ले ले।
ये तेरा मुस्काना,
मेरी जान ना ले ले।

सोचता हूँ कह दूं
जो मेरे दिल का है अब हाल।
मगर ये इतना कठिन सवाल...

कि तेरा ना कर जाना,
मेरी जान ना ले ले।


--
इस कविता को मेरी आवाज मे यहां सुनें

4 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari said...

सोचता हूँ कह दूं
जो मेरे दिल का है अब हाल।
मगर ये इतना कठिन सवाल...
कि तेरा ना कर जाना,
मेरी जान ना ले ले।


---इससे काम नहीं चलेगा, बालक.

एक बार हिम्मत करके सवाल कर ही डालो. बच जाओ तो आकर बताना वरना कुछ दिन में हम लोग खुद ही समझ जायेंगे कि जान ले ली. शुभकामनायें. :)

-बढ़िया कविता गढ़ ली, बधाई.

विपुल जैन said...

too good

परमजीत बाली said...

बढिया रचना है ।बधाई।

alok kumar said...

To fir aap kisi ke muskuraane par bhi pratibandh laga rahe hain...
pal do pal to sab ko muskuraane ka hak hai :))

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