विविध भारती या रेडिओ मिर्ची ?
बहुत दिनों के बाद कहीँ जाओ, तो परिवर्तन इस क़दर झलकने लगता है मानो शांत झील की पेंदी मे पड़ा कंकड़। इस बार घर गया तो अनेकानेक परिवर्तनों से दो चार होना पड़ा। उसका एक कारण तो सीधा है : बिहार मे सत्ता परिवर्तन। जो सड़के १८-१९ सालों से नहीं बनी थी वो बन गयीं। गांवों मे कंप्यूटर सिक्षण संस्थान खुल गए। (८ साल पहले मैं १०-१५ किलोमीटर दूर शहर जाता था)। सो, अब कुछ गाँव की लडकियां भी कीबोर्ड और माऊस का मतलब समझने लगी हैं।
परंतु मुझे इन सारी चीजों को लिखने मे कोई रूचि नही है। क्यूंकि मैं यह नही चाहता कि लोग मुझपर वर्तमान सरकार के पिछलग्गू होने का आरोप लगा दें। राजनीति से तटस्थ रहना चाहता हूँ। सो इस बात का भी जिक्र नही करूंगा कि पटना मे भी शोपिंग मॉल्स खुलने लगे हैं। और वैसे भी इन सारे विषयों मे चिन्तन का स्कोप नही है। :)
मेरे पापा पुराने गानों के शौक़ीन हैं। हर रात विविध भारती का छाया गीत घर में छाया रहता था। पर इस बार जब मैंने रेडियो को विविध भारती पर ट्यून किया तो वो भड़क उठे। बोले, 'बोर मत करो यार। मिर्ची लगाओ। क्यूंकि मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश।' अब इस ओल्वेज खुश प्रवृति देखकर मुझे आश्चर्य तो हुआ परंतु मैं तर्क करके उनके मूड को खराब नही करना चाहता था। अतएव मैंने धीरे धीरे उनके इस परिवर्तन का कारण जानना चाहा। यूनुस जी! ध्यान दें!
पापा ने कहा कि पहली बात कि मिर्ची मे घर्र घर्र नही होता। एकदम किलियर आवाज। और फिर अनाउनसर भी एक रीजन है।
'क्या कह रहे हैं? यूनुस जी की आवाज तो...'
'अरे मैं जानता हूँ। उनकी आवाज बहुत अच्छी है। लेकिन वो बंधे हुए लोग हैं। बिंदास नही बोलते। रोबोट की तरह बोले जाते हैं। अभी 'शिप्रा' को देखो। बेटा! बोलने का अंदाज बड़ी चीज है। विविध भारती और मिर्ची मे यही अंतर है कि मिर्ची वाले की आवाज मे गम्भीरता नही एक चुलबुलापन है। जो ज्यादा आनंद देता है। और फिर.......(सस्पेंस बनाते हुए)मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश! '
यह कहके वो हँसने लगे और मैंने मन ही मन सोचा कि जब पापा जैसे फैन मिर्ची अपना रहे हैं तो बाकियों का क्या? जितने दिन घर पर रहा कभी किसी ने मिर्ची के अलावा कुछ और नही सुनने दिया। और मेरे पडोसियों का भी यही हाल था। लोकल ट्रेन के डब्बों मे भी कुछ लोगों को बहस करते सुना। और अंततः ये विचार वहाँ भी सर्वसम्मति से पारित हुआ की मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश।
आह केतना कम्पटीशन है! बजवो सुने के पहिले हेतना नौटंकी। जैसे केबल वालों ने दूरदर्शन भगाया अब ये मिर्ची वाले कहीँ....! राम बचावे!
परंतु मुझे इन सारी चीजों को लिखने मे कोई रूचि नही है। क्यूंकि मैं यह नही चाहता कि लोग मुझपर वर्तमान सरकार के पिछलग्गू होने का आरोप लगा दें। राजनीति से तटस्थ रहना चाहता हूँ। सो इस बात का भी जिक्र नही करूंगा कि पटना मे भी शोपिंग मॉल्स खुलने लगे हैं। और वैसे भी इन सारे विषयों मे चिन्तन का स्कोप नही है। :)
मेरे पापा पुराने गानों के शौक़ीन हैं। हर रात विविध भारती का छाया गीत घर में छाया रहता था। पर इस बार जब मैंने रेडियो को विविध भारती पर ट्यून किया तो वो भड़क उठे। बोले, 'बोर मत करो यार। मिर्ची लगाओ। क्यूंकि मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश।' अब इस ओल्वेज खुश प्रवृति देखकर मुझे आश्चर्य तो हुआ परंतु मैं तर्क करके उनके मूड को खराब नही करना चाहता था। अतएव मैंने धीरे धीरे उनके इस परिवर्तन का कारण जानना चाहा। यूनुस जी! ध्यान दें!
पापा ने कहा कि पहली बात कि मिर्ची मे घर्र घर्र नही होता। एकदम किलियर आवाज। और फिर अनाउनसर भी एक रीजन है।
'क्या कह रहे हैं? यूनुस जी की आवाज तो...'
'अरे मैं जानता हूँ। उनकी आवाज बहुत अच्छी है। लेकिन वो बंधे हुए लोग हैं। बिंदास नही बोलते। रोबोट की तरह बोले जाते हैं। अभी 'शिप्रा' को देखो। बेटा! बोलने का अंदाज बड़ी चीज है। विविध भारती और मिर्ची मे यही अंतर है कि मिर्ची वाले की आवाज मे गम्भीरता नही एक चुलबुलापन है। जो ज्यादा आनंद देता है। और फिर.......(सस्पेंस बनाते हुए)मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश! '
यह कहके वो हँसने लगे और मैंने मन ही मन सोचा कि जब पापा जैसे फैन मिर्ची अपना रहे हैं तो बाकियों का क्या? जितने दिन घर पर रहा कभी किसी ने मिर्ची के अलावा कुछ और नही सुनने दिया। और मेरे पडोसियों का भी यही हाल था। लोकल ट्रेन के डब्बों मे भी कुछ लोगों को बहस करते सुना। और अंततः ये विचार वहाँ भी सर्वसम्मति से पारित हुआ की मिर्ची सुनने वाले ओल्वेज़ खुश।
आह केतना कम्पटीशन है! बजवो सुने के पहिले हेतना नौटंकी। जैसे केबल वालों ने दूरदर्शन भगाया अब ये मिर्ची वाले कहीँ....! राम बचावे!

Comparing vividh bharti with mirchis would be like comparing a mature golden ager with a rebellious teenager.Armed with their verbose RJs(most of whom won't be able to tell apart music from donkey's cry) , these fm stations appear to lead the popularity charts but then when has popularity been the gauge of quality.We r all familiar with the obnoxious shapes that our news channels have taken in their quest for popularity.
Without any commercial support(except vicco vajradanti of course which has been the sole sponsor of many of its programs) vb's kamal sharmas and nimmi mishras have managed to provide the enchantment of true hindi music over the years.
Had it been in the hands of repetitive radio mirchis, the likes of majrooh sultanpuris and talat mehmoods would have been long-lost.
चाहे रेडियो मिर्ची हो या विविध भारती, भारत से बाहर रहने वालों के लिए तो दोनों ही पुराने डायनोसार के युग के हैं. दुनिया में वेब रेडियो चल रहे हैं, कोई भी थोड़ा सा आत्मसम्मान वाला रेडियो हो तुरंत अपने वेब पृष्ठ से भी प्रसारण की सुविधा देता है पर यह रेडियो मिर्ची ने अभी तक नहीं किया. जहाँ तक विविध भारती का हाल का पिछले चार सालों से उनके वेबपृष्ठ पर यही लिखा आ रहा कि "लाईव रेडियो" की सुविधा कुछ समय के लिए बंद है!
परंतु मिर्ची बहुत बोर करता है. कोई भी नया गाना आएगा - हीमेश का मान लो - बजा बजा कर सुनने वाले को बजा डालता है.
मैं तो कहूंगा वेराइटी के मामले में विविध भारती दा जवाब नहीं.
पर हाँ, आपको मिर्ची जैसी सीडी क्वालिटी में सुनना हो तो डिश टीवी से सराउंड साउंड में डॉल्बी वर्चुअल 5-1 सिस्टम में सुनो. मिर्ची डब्बा लगेगी.
हमारे लिये तो अब युनुस ही रेडियो हैं. यहाँ तो दोनों ही नहीं आते. मगर जब तक हिन्दुस्तान में थे, विविध भारती ही सुना. इसलिये रेडियो की बात आते ही युनुस भाई या अमीन सहानी वाली शैली की याद आती है.
रेडियो मिर्ची या जल्द अवतरित होने वाले उस जैसे और एफ़.एम.रेडियोज़..बर्गर या पित्ज़ा हैं और विविध भारती ? घर की सब्ज़ी-रोटी या दलिया मूंग की दाल ...हाज़मा कभी नहीं बिगाड़ते.लेकिन ये भी मानना पडे़गा के फ़िज़ाँ में फ़िर से महकने वाले रेडियो प्रेम का श्रेय भी एफ़.एम.रेडियोज़ को देना पडे़गा..रवि भाई आप इनके अस्तित्व को नकार नहीं सकते..ये ज़माने की ज़रूरत बन रहे हैं . इन्दौर में रॆडियो मिर्ची सबसे ज़्यादा सुना जा रहा है . लेकिन हाँ ये भी सच है कि एफ़.एम.रेडियो चैनल्स की अपनी कारोबारी प्रतिबध्दताएँ हैं..विविध भारती शासकीय मदद से चलने वाला चैनल है इसलिये चल रहा है वरना उसकी आर्थिक मजबूरियों का हाल प्रसार भारती या मुझ जैसे लोग जानते हैं जिन्हें आकाशवाणी पिछले पाँच छह बरस से नाटक में भाग लेने बुला नहीं पा रही है क्योंकि भुगतान का संकट बना हुआ है.रीच या श्रोता संख्या के मामले में आज भी आकाशवाणी या विविध भारती लाजवाब हैं . उसकी वजह राकेश जोशी,कमल शर्मा,युनूस ख़ान, ममता सिंह,रेणु बंसल,कांचन प्रकाश संगीत या निम्मी (माथुर)मिश्रा जैसे समर्पित लोग हैं जिनके लिये रेडियो नौकरी नहीं..जज़्बा और जुनून है.
मेरी बात पर यक़ीन करें ; गुजरात के भूकंप के समय आकाशवाणी राजकोट,अहमदाबाद और भुज केन्द्र ने पूरी पूरी रात लाइव प्रसारण किये हैं..एनाउंसर्स तीन तीन दिन घर नहीं गए हैं और केन्द्र परिसर में ही चंद घंटे सुस्ता कर काम करते रहे हैं ..भूकंप में लापता हुए लोगों के परिजनों को हिम्मत दिलाते रहे हैं
ऐसा कोई काम कोई एफ़.एम.रेडियो स्टेशन कर सकता है ..मुझे शक है.
सही कहा विकास । पर चूंकि मैं लकीर के इस तरफ हूं इसलिये मुझे तर्क-वितर्क तो करना ही है । वैसे आपके ब्लॉग पर आई पहली टिप्पणी में काफी कुछ कह दिया गया है । पर मोटे तौर पर कुछ बातें कहना चाहूंगा । विविध भारती या प्राईवेट चैनल के विमर्श पर मैं एक लंबा परचा लिखने वाला हूं इसलिये यहां संक्षिप्त बातें—
1. प्राईवेट चैनलों का इतिहास अभी महज़ कुछेक साल पुराना है और वो अभी भी अपने क्रमिक-विकास के दौर पर ही हैं । उन्होंने धड़ाम धूम बोलने और धड़ाम धूम गानों का फॉरमूला अपनाया और इससे श्रोताओं को लुभाया है, चूंकि विविध भारती के प्रसारण में बोलने का तरीक़ा संयत और सरल है इसलिये अकसर ये कहा जाता है कि ये प्रसारण उबाऊ और रसहीन है । लेकिन केवल एक ही अनुरोध है, कृपया बताएं कि लगातार आप कितनी देर रेडियो मिर्ची या कोई और चैनल सुन सकते हैं । कितनी देर सुनने के बाद आपको लगता है कि ये हैमरिंग अब बर्दाश्त से बाहर हो गयी है । कितनी देर बाद आपको ये लगने लगता है कि ये गाने वे नहीं हैं जिनसे हम ‘आईडेन्टिफाई’ करते हैं । मेरा सर्वेक्षण कहता है कि अलग-अलग पीढ़ी के मुताबिक़ इसमें थोड़ा फ़र्क़ आता है लेकिन इतना तो तय है कि प्राईवेट चैनलों की पंचम सुरी हैमरिंग थोड़ी देर में सिर दर्द का सबब बन जाती है । उनकी सबसे बड़ी सीमा उनका लगातार एक जैसा बोलना और एक जैसे गाने सुनाना है ।
2. लेकिन उनकी ताक़त है उनके प्रसारण की क्वालिटी । जिन जगहों पर विविध भारती एफ एम पर है वहां कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जहां विविध भारती के एफ एम प्रसारण उपलब्ध नहीं हैं वहां लोग प्राईवेट रेडियो स्टेशन को उनके प्रसारण की गुणवत्ता के लिए सुनते हैं । पर आप तो इंजीनियर हो बताओ कि एफ एम प्रसारण की अधिकतम सीमा कितनी है, कहा जाता है कि भौगोलिक रूप से सौ एयर किलोमीटर तक सुना जाना चाहिये लेकिन व्यवहारिक रूप से देखा जाये तो साठ से अस्सी किलोमीटर से आगे आप एफ एम को नहीं सुन पाते । चाहे भारत के किसी हिस्से में भी हों । अगर भौगोलिक रूप से दुर्गम इलाक़े में हों तो और दिक्कत ।
3. ‘ऑलवेज़ खुश’ वाला फॉरमूला नया है, इसलिये चलित है । विविध भारती का नया फॉरमूला है ‘पचास सालों से आपकी सेवा में’ और ‘भारत का जीवन संगीत’ । विविध भारती देश की सुरीली धड़कन । चलिये फॉरमूले तो छोटी मोटी चीज़ें हैं । पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि विविध भारती पिछले पचास सालों से भारत के गली कूचों में गूंज रहा है, मनोरंजन और सूचना के जितने फॉरमेट हो सकते हैं सभी इस चैनल ने आज़माए हैं, चूंकि मैं यहां काम करता हूं इसलिये नहीं कह रहा हूं लेकिन ये ज़मीनी हकीकत है कि केवल मनोरंजन के भरोसे कोई टिक नहीं सकता । जनता की अपेक्षाएं इससे भी कहीं ज्यादा होती हैं । प्रसारण का वृहद मक़सद है—सूचना शिक्षा और मनोरंजन । और इन तीनों पक्षों को जब तक संतुलित नहीं किया जाता तब तक किसी का भी काम नहीं बनेगा । विविध भारती ने कई प्रोग्रामों के ताज़ातरीन फॉरमेट बनाये हैं जिन्हें बाद में टी.वी. ने अपनाया । आज भी ये दृढ़ मान्यता है कि ‘स्पोकन वर्ड’ के बिना कोई भी ‘रेडियो-चैनल’ सस्टेन नहीं कर सकता । ये चैनल आज भी उन्हीं डेढ़ सौ गीतों को दोहरा के अपना ढोल बजा रहे हैं । अगर कहीं इनकी सनसनी दिख रही है तो वो केवल शांत पानी में पत्थर फेंक देने जैसी है, जो वक्त रहते खत्म हो जाती है ।
4. नये गाने तो दस रूपए की सीडी में भी मिल जाते हैं और इन चैनलों पर भी । लेकिन अच्छा संगीत मिलना किस क़दर मुश्किल है, वो संगीत के आपके जैसे क़द्रदां जानते हैं । ये संगीत बहुत ही सूक्ष्म मात्रा में है इन चैनलों पर । वो हमारे यहां है और प्रचुरता में है । एक एफ.एम. चैनल केवल छोटे इलाक़े में मेहदूद हो सकता है, हम पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया में विद्यमान हैं । और डी.टी.एच. के ज़रिए फैलते जा रहे हैं । हम राष्ट्रीय हैं । हमारी अपनी सांस्कृतिक और रचनात्मक विरासत है । ये हम नहीं हमारे श्रोता कहते हैं । फैसला इतिहास करेगा । क्योंकि नये एफ.एम.स्टेशन अभी बच्चे हैं इन्हें युवा और समझदार बनने तक इंतज़ार कीजिये । और ये भी देखिए कि इसमें ये कितना वक्त लगाते हैं ।
5. नौशाद से लेकर मुकेश, रफी, तलत, मन्नाडे, हेमंत कुमार । समस्त संभव गीतकार और संगीतकार । समस्त संभव अभिनेता और निर्देशकों की रिकॉर्डिंग और रिफरेन्स का गढ़ है विविध भारती । याद रहे कि हिमेश रेशमिया या आदेश श्रीवास्तव से संगीत का इतिहास मुकम्मल नहीं होता । फिर नये संगीत की शेल्फ लाईफ से तो आप भी वाकिफ हैं ।
तो ये कुछ मोटे मोटे मुद्दे हैं । मेरे विस्तृत पर्चे का इंतज़ार कीजियेगा । शायद इन बहसों के लिये ही जल्दी आ रहा हमारा सामूहिक ब्लॉग रेडियोनामा एक रचनात्मक मंच बने । तब आपकी भी जरूरत पड़ेगी ।
इतनी बढिया चर्चा हो गई है यहाँ कि कुछ कहने से रोक नही पा रहा अपने आप को।
पहली बात, कि रेडियो की दुनिया में विविध भारती के पास जो लीड है, वो तो रहनी ही है, क्योंकि मेरे खयाल से फिल्म संगीत का जो संग्रह उनके पास है, शायद ही कहीं होगा।
बाकी तो गुणीजन इतनी लंबी लंबी छोड गये हैं...टिप्पणियाँ...अधिकांश से सहमत हूं।
यूनुस भाई के पर्चे का इंतजार रहेगा
यूनस भाई का जाबाब नही....मिर्ची सुना नही...बिविधभारती जहा आता नही...फ़िर कया करे....आप भी सुने....london(uk) से...
http://www.sunriseradio.com ओर हो सके तो रवि शर्मा का प्रोगराम जरुर सुने युरोपिअन समय १० से १२ बजे तक सुबह
काफ़ी चर्चा हो गयी नये-पुराने,परिपक्वता,स्वस्थ मनोरंजन आदि विषयों को लेकर। अभी १० दिन पहले यहाँ वाराणसी में भी इन चैनलों का आगमन हुआ है। इनका क्या प्रभाव होगा हमारे सांस्कृतिक पहलू पर यह तो वक़्त के साथ ही स्पष्ट होगा । मुझे एकबारगी यह विषय बहस के लिये नहीं जँचता। क्योंकि परिणाम स्पष्ट है। मुझे लगता है कि यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू है-चमक के पीछे भागना,चिन्तन के अभाव में यह और भी उत्प्रेरित होता है।
संजय पटेल जी की बात बिल्कुल सही है कि 'फ़िज़ाँ में फ़िर से महकने वाले रेडियो प्रेम का श्रेय भी एफ़।एम।रेडियोज़ को देना पडे़गा'. मैं हर जगह कि बात नही जानता लेकिन पटना मे रेडिओ की बिक्री मिर्ची आने के बाद बहुत ज्यादा बढ गयी (मुझे इस बिजनेस से जुडे लोगों ने बताया) ।
मैं विविध भारती की रेडियो निष्ठा पर कदापि संदेह नही कर्ता और ये बखूबी जानता हूँ की प्राइवेट चैनल कभी भी इस मामले मे बराबरी नही कर पायेंगे।
यूनुस जी ने कहा है कि '...अलग-अलग पीढ़ी के मुताबिक़ इसमें थोड़ा फ़र्क़ आता है...' मैं केवल इसी बात की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता था कि बदलते माहौल मे अगर विविध भारती भी थोड़ी विविधता ले आये तो बात ही कुछ और हो। भौगोलिक दिक्कतें तो आएँगी ही। शायद इसीलिये प्राइवेट चैनल मुख्य शहरो को अपना निशाना बनाती हैं और जहाँ जहाँ उनका बाण चलता है वहां वहां तब्दीलियाँ तो आती ही हैं। कितने ऐसे लोग हैं (देल्ही या मुम्बई मे) जी अपनी कार मे विविध भारती सुनते हैं? कार मे मिर्ची सुनने वालों की तादाद क्या उनसे ज्यादा नही?
एक बार फिर कहना चाहूँगा कि मैं खुद को इस काबिल नही समझता कि विविध भारती या मिर्ची को कुछ सुझाव दे सकूं। मेरा उद्देश्य सिर्फ वो बातें बतानी थी जो मैंने महसूस की। मेरा अनुभव गलत भी हो सकता है, तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। पर इतनी अच्छी चर्चा हो गयी, इसकी ख़ुशी भी है। यूनुस जी के चिट्ठे का इंतज़ार है, जानता हूँ की कई नयी बातें जानने सीखने को मिलेगी।
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