रे मच्छर
रे मच्छर!
क्या तुम्हारी बुद्धि भी
तुम्हारे आकार के अनुकूल है?
जिसे तुम अपनी जीविका समझते हो
वो तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है।
तू अमृत के धोखे मे
विषपान कर रहा है।
तू मनुष्य को नही
वरन मनुष्य तुझे नुकसान कर रहा है।
आख़िर मनुष्य का ख़ून है
कभी ना कभी तो असर दिखायेगा।
फिर तुम्हारे दिल से भी
ख़ून के रिश्तों का अर्थ मिट जाएगा।
और शायद एक दिन अपने बेटे,
अपने भाई या अपने बाप का ख़ून
तेरे भी होंठों पर चमकता नजर आएगा।
क्या तुम्हारी बुद्धि भी
तुम्हारे आकार के अनुकूल है?
जिसे तुम अपनी जीविका समझते हो
वो तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है।
तू अमृत के धोखे मे
विषपान कर रहा है।
तू मनुष्य को नही
वरन मनुष्य तुझे नुकसान कर रहा है।
आख़िर मनुष्य का ख़ून है
कभी ना कभी तो असर दिखायेगा।
फिर तुम्हारे दिल से भी
ख़ून के रिश्तों का अर्थ मिट जाएगा।
और शायद एक दिन अपने बेटे,
अपने भाई या अपने बाप का ख़ून
तेरे भी होंठों पर चमकता नजर आएगा।

भाव और व्यंग्य दोनों बड़िया है।
बहुत सही. करारा व्यंग्य.
आहहा…बहुत बेहतरीन व्यंग है मानव के उपर…।
यकीनन बहुत अच्छा लिखा है आपने. विषय में गंभीरता के साथ-साथ व्यंग्य को भी बखूबी समाहित किया है.
bahut accha hai bhai..
oh bechaara machchhar :P
Post a Comment