रे मच्छर

रे मच्छर!
क्या तुम्हारी बुद्धि भी
तुम्हारे आकार के अनुकूल है?
जिसे तुम अपनी जीविका समझते हो
वो तुम्हारी बहुत बड़ी भूल है।

तू अमृत के धोखे मे
विषपान कर रहा है।
तू मनुष्य को नही
वरन मनुष्य तुझे नुकसान कर रहा है।

आख़िर मनुष्य का ख़ून है
कभी ना कभी तो असर दिखायेगा।
फिर तुम्हारे दिल से भी
ख़ून के रिश्तों का अर्थ मिट जाएगा।

और शायद एक दिन अपने बेटे,
अपने भाई या अपने बाप का ख़ून
तेरे भी होंठों पर चमकता नजर आएगा।

6 टिप्पणियाँ

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ratna said...

भाव और व्यंग्य दोनों बड़िया है।


Udan Tashtari said...

बहुत सही. करारा व्यंग्य.


Divine India said...

आहहा…बहुत बेहतरीन व्यंग है मानव के उपर…।


रवीन्द्र रंजन said...

यकीनन बहुत अच्छा लिखा है आपने. विषय में गंभीरता के साथ-साथ व्यंग्य को भी बखूबी समाहित किया है.


crazy devil said...

bahut accha hai bhai..


alok kumar said...

oh bechaara machchhar :P

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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