बचना ओ हसीनों! लो मैं आ गया...!

मैं जानता हूँ कि मेरे ब्लोग पर आने वाले अधिकांश जन अ-हसीं हैं परंतु फिर भी मैंने अपने शीर्षक को ऐसा नाम दिया है। सो, सेंसिटिव किसम के लोगों से क्षमायाचना करता हूँ। (वैसे आजकल मांगने से कहॉ कुछ मिलता है? मैं तो बस थोडा सा फोर्मल हो रहा था।)

बहुत दिनों बाद कुछ दिनों के लिए घर गया था। काफी अच्छा लगा और एक बार फिर जमीनी हकीकत से रूबरू होने का मौका मिला, जो कॉलेज मे नहीं मिलता। इस संबंध मे कभी डिटेल में लिखूंगा। अभी अभी आया हूँ, यात्रा कि थकान उतर जाये, फिर क्या...??? आपको बोर करने का तो ठेका हम लिए ही बैठे हैं।

बहुत लोगों के पोस्ट्स नहीं पढ़ पाया, लेकिन अब वो सारी कमी पूरी करूंगा। सो, मेरी अनुपस्थिति का बदला मेरे ब्लोग से ना लें। :)

5 टिप्पणियाँ

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Sanjeet Tripathi said...

चलो अच्छा है कि वापस आ गए , लौट के बुद्धू ब्लॉगजगत में वापस आए, सही है ना।:)


Udan Tashtari said...

बिना बताये गये थे ये तो गलत बात है. हम खाम खाँ परेशान हो रहे थे. :)


अनूप् शुक्ल् said...

आओ फिर् से स्वागत् है।


mamta said...

welcome back !!!


yunus said...

जब नहीं आये थे तुम तब भी तो तुम आए थे...............blah blah blah
चलो अच्‍छा है तुम आ गये ।

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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