मेरा एक गीत सूनें

मैंने यह गीत कुछ दिनों पहले लिखा था। मुम्बई वापस आने के बाद आज सोचा की आज इस गीत को गाकर ही सुना दूं। सावधान! मुझे गाना नही आता और ना ही मेरे पास कोई रिकॉर्डिंग स्टूडियो है इसलिये ज्यादा उम्मीद ना करें. यह गाना मजाक मे लिखा गया था. अपने कमेंट्स जरूर दें। अपना टेबल बजा के मैं ही गा रहा हूँ।

बोल यहां हैं : http://vikashkablog.blogspot.com/2007/05/blog-post_26.html

और गीत यहां: http://vikash.mypodcast.com/2007/07/post-25886.html

1 टिप्पणियाँ

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Udan Tashtari said...

जो तू पास न आये
-मगर न जाने क्यूँ सहगल साहब की याद में आँख भर आई.
वाह वाह!! बड़े आत्म विश्वास के साथ गाया गीत पसंद किया गया!! :)

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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