अरे रुको! ऊब गया हूँ तुमसे
अरे रुको!
ऊब गया हूँ तुमसे
रोज रोज चले आते हो
मेरी कविताओं मे
रुदन, विरह और प्रेम ढूँढने
क्या सारे जहाँ में
इन सबका ठेका मैंने ही ले रखा है?
इस तरह तो तुम
मेरी अन्य भावनाओं को मार डालोगे।
हाँ!
अभी सही शब्द मिला
'हत्यारे' हो तुम लोग।
मुझे भी शौक़ है
कुछ विचारोत्तेजक लिखने का
मेरी लेखनी भी
तुम्हारे अनेकानेक वादों पर
अभिव्यक्त होना चाहती है।
(अब 'वादों' में प्रीत के वादे मत ढूँढो!
मैं छायावाद जैसे अपवादों की बात कह रहा हूँ।)
मेरी लेखनी भी भिक्षुक की टीस
और पत्थर तोड़ती नारी की वेदना
लिखने को मचलती है।
मेरी कल्पना की उड़ान भी
हिमालय को बांधना चाहती है.
कर्ण एवं उर्मिला जैसे
अपेक्षाकृत उपेक्षित पात्रों पर
महाकाव्य उडेलना चाहती है।
कब तक?
आख़िर कब तक
मैं विरहाग्नि को शब्द देता फिरूंगा...?
प्रेम की जमीन से उठकर
गन्दी बस्तियों मे जाना है मुझे।
(वैसे आजकल तो प्रेम की जमीन पर भी
गन्दी बस्तियां बसने लगी हैं)
सो रुको!
तनिक रुको!
और मेरे संग गन्दी बस्तियों मे चलो।
जो बारिश की बूँदें
मेरे शब्दों मे प्रीतम की प्यास बनकर आती थी
अब वो छतों से टपकती मुफलिसी मे समाती है।
अब देखो
मेघदूत केवल प्रीत के संदेशे नही
नालीयों की सड़ांध भी लाते हैं।
ना ना!
नाक पर रुमाल रखने की जरूरत नही
जहाँ पहनने के लिए कपडे नही
वहाँ रुमाल भी एक विलास है.
(इतनी सी बात तुम्हारी समझ क्यों नही आती?)
क्यों?
अब बोलो?
प्रेम का नीर नही
आलोचना का सागर दूंगा तुम्हे।
क्या अब भी साहस है मेरे पास आने का...?
ऊब गया हूँ तुमसे
रोज रोज चले आते हो
मेरी कविताओं मे
रुदन, विरह और प्रेम ढूँढने
क्या सारे जहाँ में
इन सबका ठेका मैंने ही ले रखा है?
इस तरह तो तुम
मेरी अन्य भावनाओं को मार डालोगे।
हाँ!
अभी सही शब्द मिला
'हत्यारे' हो तुम लोग।
मुझे भी शौक़ है
कुछ विचारोत्तेजक लिखने का
मेरी लेखनी भी
तुम्हारे अनेकानेक वादों पर
अभिव्यक्त होना चाहती है।
(अब 'वादों' में प्रीत के वादे मत ढूँढो!
मैं छायावाद जैसे अपवादों की बात कह रहा हूँ।)
मेरी लेखनी भी भिक्षुक की टीस
और पत्थर तोड़ती नारी की वेदना
लिखने को मचलती है।
मेरी कल्पना की उड़ान भी
हिमालय को बांधना चाहती है.
कर्ण एवं उर्मिला जैसे
अपेक्षाकृत उपेक्षित पात्रों पर
महाकाव्य उडेलना चाहती है।
कब तक?
आख़िर कब तक
मैं विरहाग्नि को शब्द देता फिरूंगा...?
प्रेम की जमीन से उठकर
गन्दी बस्तियों मे जाना है मुझे।
(वैसे आजकल तो प्रेम की जमीन पर भी
गन्दी बस्तियां बसने लगी हैं)
सो रुको!
तनिक रुको!
और मेरे संग गन्दी बस्तियों मे चलो।
जो बारिश की बूँदें
मेरे शब्दों मे प्रीतम की प्यास बनकर आती थी
अब वो छतों से टपकती मुफलिसी मे समाती है।
अब देखो
मेघदूत केवल प्रीत के संदेशे नही
नालीयों की सड़ांध भी लाते हैं।
ना ना!
नाक पर रुमाल रखने की जरूरत नही
जहाँ पहनने के लिए कपडे नही
वहाँ रुमाल भी एक विलास है.
(इतनी सी बात तुम्हारी समझ क्यों नही आती?)
क्यों?
अब बोलो?
प्रेम का नीर नही
आलोचना का सागर दूंगा तुम्हे।
क्या अब भी साहस है मेरे पास आने का...?
बहुत बहुत बधाई इतनी गहरी रचना रच गये पूना छोड़ते छोड़ते:
जहाँ पहनने के लिए कपडे नही
वहाँ रुमाल भी एक विलास है.
--क्या बात है..कई बार पढ़ ली है यह रचना. लिखते रहो.
विकास आप तो बहुत ही अच्छी कविता लिखने लगे है। और इतनी सुन्दर और सजीव कविता लिखने के लिए बधाई ।
abhi tak ka sabse best :)))
बहुत गहराई है आपकी बातों में…रचना पढते-पढते दुष्यन्त कुमार का सा आभास हुआ…
सुनीता(शानू)
aur haan...ye bhi yaad rakhiyega ki mere janmdin par aapne ye adbhut poem likhi hai...main kabhi nahiii bhooloonga is poem ko !!!!!!!!!
aur haan...ye bhi yaad rakhiyega ki mere janmdin par aapne ye adbhut poem likhi hai...main kabhi nahiii bhooloonga is poem ko !!!!!!!!!
aaj hi is rachna ko "Kavita " community me padha...
bahut acchi hai....
kabhi lagta hai ki khud se lad rahe ho...
kabhi lagta hai shayad apne man ki
bhadaas ko hum par utaar rahe ho....
Per jis tarah tumne itne goodh vishay ko prastut kiya hai wo nisandeh hio prashansaniy hai!
keep it up1
simply loved it.... par dost aap prem k baare mein likhein, viray k baare mein ya phir itne goodh vishayayon par....har baar gehraai aur sacchayi hoti hi hai aapkirachnaon mein....isiliye vo appealing hoti hain.... godd wrk...keep it up!!!
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