सुपर ३० बंद - इतना विवाद क्यों?
closure of Super 30 -II
हर इन्सान अपनी जिम्मेवारी स्वयम ही निर्धारित करता है, इसमे कोई संदेह नही। और फिर मैं यह भी नहीं मानता कि नैतिकता का कोई भी पाठयक्रम हमारे विवेक व अंतःकरण को संशोधित कर सकता है। सुपर ३० निःसंदेह अपने आप मे एक उदाहरण है। परंतु जब तक 'नेकी कर और दरिया मे डाल' वाला दर्शन ना अपनाएँगे तब तक किसी ना किसी तरह उनके इस पावन प्रयास को कोई ना कोई अपवित्र करता ही रहेगा।
इस बात का यकीन तो नही होता कि कोई इतना कृतघ्न व्यवहार कर सकता है परंतु अब बात इतनी फैल गयी है तो कुछ सत्यता तो होगी ही। शायद हुआ यह होगा कि कुछ छात्रों ने अन्य कोचिंग वालों की भी मदद ले ली होगी, जो कि JEE देने वाले अधिकांश छात्र करते ही हैं। अब अगर उन संस्थानों ने भी सफलता का थोडा श्रेय लेने की कोशिश की तो कितना उचित किया इसकी मीमांसा तो मैं नही करूंगा। परंतु मेरा यह मानना है कि चीजों को सहिष्णुता से, बिना मीडिया के पचड़े मे पडे सुलझाया जा सकता था।
आग्रह पत्र : अभ्यानंद जी और अनंद कुमार जी के लिए.
आग्रह पत्र : अभ्यानंद जी और अनंद कुमार जी के लिए.
अशोक जी ने बडे ही प्यारे शब्दों मे सुपर ३० को बंद ना करने का जो निवेदन किया है, वो नमन के योग्य है। मैं भी चाहता था कि इस तरह का कोई प्रयास करूं। परंतु किसी कि निजता मे दखलंदाजी का बोध आड़े आ गया।

Hi विकास,
मैं तुम्हारी बात से सहमत हूँ कि अंततः हमारी नैतिकता हमारे अलावे और कोई परिभाषित नही कर सकता। पर आख़िर क्या सही है और क्या गलत ए हम अपने आस पास , अपने समाज अपने परिवार से ही सीखते हैं। यदि नैतिकता को हमारे curriculam का हिस्सा बाना दिया जाये तो भी इससे बहूत ज्यादा अंतर नही पड़ेगा, तुम्हारी ये बात भी सही है। पर कोई तो तरीका होगा, जिससे लोग सही और गलत के अंतर को महसूस कर सकें। जँहा तक मुझे लगता है "philosophy" की पढ़ाई शायद इसमे मददगार साबित हो। पर इसे कोर्स का हिस्सा ना बना कर एक वाद विवाद कि तरह पढ़ाया जाना चाहिए। लड़कों को ज्यादा से ज्यादा और मुश्किल से मुश्किल प्रश्न पूछने और फिर साथ मिलकर उनका हल निकालने कि कोशिश कि जानी चाहिए।
अभी फिलहाल मैं Amdocs, Cyprus मे s/w proffesional का काम कर रह हूँ।
Netarhat १९९१-१९९५ (प्रेम aashram)
Science College १९९५-९७
हिंदु College, Delhi १९९८-२००१
NIT, Trichy २००१-२००४ (MCA)
मनोज
philosophy, psychology, sociology....etc are already in our course curriculam. :)
यह तो किनारों पर बैठकर मझधार का तमाशा देखने वाली बात हुंई । हम लोग अपने आप को शरीक कर बात करना कब शुरू करेंगे ?
'सक्रिय दुर्जन - निष्क्रिय सज्जन' हमारा मूल संकट है । अभयानन्दजी और आनन्दकुमारजी से सम्पर्क कर उनका दर्द जानने की कोशिश करनी चाहिए और 'सुपर 30' जारी रखने के अनुरोध के साथ ही पूछना चाहिए कि उनके इस नेक काम में हम लोग उनकी क्या मदद कर सकते हैं ।
किनारों से उतर कर, मझधार मे जाकर उनका हाथ पकडें और बताएं कि वे अकेले नहीं हैं ।
इन दोनों महानुभावों का अता-पता हो तो सूचित करने की महरबानी करें ।
Post a Comment