आज मन को...


आज मन को प्यास तेरी


कह दिया जो बरसों पहले, अब उसे भूलूं तो कैसे?

पर छवि तेरी चांद जैसी, अब उसे छू लूं तो कैसे?

कैसे अब रह जाऊं तुम बिन?

कटती ना रातें तारे गिन गिन।

नींद ही आये ना जब तो स्वप्नों मे झूलूं तो कैसे?


ये काली चादर है घनेरी

आज मन को प्यास तेरी

1 टिप्पणियाँ

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sunita (shanoo) said...

मन को छू लेने वाली एक मनमोहक कविता...
सुनीता(शानू)

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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