आज मन को...

आज मन को प्यास तेरी
कह दिया जो बरसों पहले, अब उसे भूलूं तो कैसे?
पर छवि तेरी चांद जैसी, अब उसे छू लूं तो कैसे?
कैसे अब रह जाऊं तुम बिन?
कटती ना रातें तारे गिन गिन।
नींद ही आये ना जब तो स्वप्नों मे झूलूं तो कैसे?
ये काली चादर है घनेरी
आज मन को प्यास तेरी

मन को छू लेने वाली एक मनमोहक कविता...
सुनीता(शानू)
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