आज भी


आज भी
किसी झरोखे से
तुम्हारे नाम की हवा
तुम्हारी खुशबु लिए
मेरे कमरे में चली आती है।

तुम्हारी दी हुई चादर
कितनी भी लपेटूं
मेरी हड्डियों में सिहरन
फिर भी समाती है।

टूटी यादों मे
मेरा विश्वास
(ना जाने क्यों)
आज तक
अक्षुण्ण है

बिस्तर की सिलवटें
मेरे सुलझाए नहीं सुलझती
तकिये की 'जगह' पर भी
मेरा नियंत्रण सुन्न है

उन्हें भी
तुम्हारे ही हाथ चाहिऐ
उन्हें भी
तुम्हारा ही साथ चाहिऐ

अभी आज ही तो,
मेरे कमरे मे आने वाला कबूतर
तुम्हारा नाम ले कर रो रहा था।

अभी आज ही तो,
खिड़की का कांच
अपनी आँखें खोलें सो रहा था।

इस कमरे की दीवाल
की चीख
मेरे परदे फाड़ रही है

मेरे आलमारी के
एक कोने मे दबी
फोटुओं की अल्बम
मेरी ओर
हिकारत से देखती
मेरी निगाह शर्म से गाड़ रही है।

उन्हें भी
तुम्हारी एक निगाह चाहिऐ
उन्हें भी
तुम्हारी ही चाह चाहिऐ

8 टिप्पणियाँ

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alok kumar said...

आपकी कवितायें एक ही भाव पर आधारित होती जा रही है .... कब तक हमलोग भी एक ही तरह की टिप्पणि करते रहेंगे :p


Udan Tashtari said...

अच्छे भाव हैं-


विकास कुमार said...

@ आलोक
अब कविता मेरी है तो मेरी छाप तो आएगी ही। यद्यपि मैं टाईप्ड नहीं होना चाहता....लेकिन रचनायें रचनाकार की मनःस्थिति से तो प्रभावित होंगी ही। :)

@ समीर जी!
आपको तो धन्यवाद कहते कहते मुझे शर्म आने लगी है आजकल। धन्यवाद (क्षण भर के लियेशर्म को ताख पर रख दिया है)


vipin kumar said...

pune mein kaun sa kabootar hai ? mere ko toh nahi dikha tha room pe !


divas!!! said...

har lafz ko taraste aankhe...
har ahat pe japakte aankhe...
bas tere intezaar mein barasti aankhe...


har lafz jinjodh ke rakh gaya... bohat he sundar aur dil ke kareeb hai:) good work vikash


Vijendra S. Vij said...

वाह..विकास..गहरी अभिव्यक्ति है आपकी कविता मे..सीधे दिल से निकलकर दिल मे ही धंस जाये..अच्छा लिखते हो आप.
बधाई.


sunita (shanoo) said...

ओह्ह विकास माफ़ करना मैने आपकी कविता आपके चिट्ठे से नही पढी़ मालूम है कभी-कभी जो आपको अछ्छी लगती है वही चूक जाती है..आज शास्त्री जी के चिट्ठे से पढ़ा तो बहुत ही अच्छा लगा...फ़िर सोचा की आपको भी बधाई दे ही दूँ
कहाँ से समेटा है इतना दर्द...बहुत अच्छा लगा पढ़्कर..

शानू


vartika said...

really touching... bahut hi khoobsoorat rachna hai...

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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