कल्पना का आकाश
तुमने कहा -
".... अपरिचित फिर भी चिर परिचित से तुम
बिल्कुल मेरी कल्पना के आकाश की तरह...."
और मैं सकुचा गया
अपनी क्षुद्रता से।
मेरा 'अपरिचित' होना
मुझे भी सालता है।
और 'चिर-परिचित' की संज्ञा
मेरे ह्रदय को भी गुदगुदाती है।
तुम्हारा,
मुझे 'कल्पना' समझना
एक टीस सा पहूँचाता है ह्रदय को।
और मैं सकुचा जाता हूँ
अपनी क्षुद्रता से,
जिसका अहसास तुम दिलाती हो
मुझे 'आकाश' कह कर।
पर एक बात का गर्व है
कि अगर बिंधा भी तो
मेरे जैसा तुच्छ पुष्प
तुम्हारी कविताओं की माला मे बिंधा है।
".... अपरिचित फिर भी चिर परिचित से तुम
बिल्कुल मेरी कल्पना के आकाश की तरह...."
और मैं सकुचा गया
अपनी क्षुद्रता से।
मेरा 'अपरिचित' होना
मुझे भी सालता है।
और 'चिर-परिचित' की संज्ञा
मेरे ह्रदय को भी गुदगुदाती है।
तुम्हारा,
मुझे 'कल्पना' समझना
एक टीस सा पहूँचाता है ह्रदय को।
और मैं सकुचा जाता हूँ
अपनी क्षुद्रता से,
जिसका अहसास तुम दिलाती हो
मुझे 'आकाश' कह कर।
पर एक बात का गर्व है
कि अगर बिंधा भी तो
मेरे जैसा तुच्छ पुष्प
तुम्हारी कविताओं की माला मे बिंधा है।

वाह क्या बात है हर विषय पर क्रेश कोर्स हो सकता है आप संचालन करें मैं भी रिसोर्स पर्सन बनने के लिए हाजिर रहूंगी
बहुत सुंदर विकास जी भावपूर्ण रचना है...
".... अपरिचित फिर भी चिर परिचित से तुम
बिल्कुल मेरी कल्पना के आकाश की तरह...."
और फ़िर आखिरी पक्तिंयाँ...
तुम्हारा,
मुझे 'कल्पना' समझना
एक टीस सा पहूँचाता है ह्रदय को।
पर एक बात का गर्व है
कि अगर बिंधा भी तो
मेरे जैसा तुच्छ पुष्प
तुम्हारी कविताओं की माला मे बिंधा है।
अच्छा लगा पढ़्कर...
सुनीता(शानू)
ab aapki kavitaaon ke bhaaw saadhaaran nahii rahe hain....:|
कल्पना की उडान!!!!
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