झील

मैं आजतक खड़ा हूँ,
उसी झील के किनारे
जिसके प्रतिबिम्ब में
हमारी छवियाँ साथ दिखती थी।

अच्छा है - झील सूखी है।
कम से कम झील को
इस बात का अहसास तो ना हुआ
कि प्रतिबिम्ब अब टुकड़ों मे बँटा है।

डरता हूँ -
बरसात आ गयी है।
झील मे फिर पानी आ ही जाएगा।

खुद को तो अब तक समझा ना पाया
फिर झील के आंसुओं को कौन रोकेगा?

6 टिप्पणियाँ

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Udan Tashtari said...

बड़ी गहरी रचना लिख गये भाई!!


Minakshi said...

nicely put...
:)


vartika said...

kam shabdon mein bahut kuch keh diya hai aapne nd shayad yehi kam shabd aapki kavita ko gehraayi de rahe hain... bahut hi napi tuli aur kasi hui kavita hai..... really beautiful........[:)]


विकास कुमार said...

thnx thanx thanks. :)


राजीव रंजन प्रसाद said...

अंतिम पंक्तियों नें संवेदित कर दिया। बहुत ही अच्छी रचना।

*** राजीव रंजन प्रसाद


विकास कुमार said...

धन्यवाद राजीव जी!

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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