झील
मैं आजतक खड़ा हूँ,
उसी झील के किनारे
जिसके प्रतिबिम्ब में
हमारी छवियाँ साथ दिखती थी।
अच्छा है - झील सूखी है।
कम से कम झील को
इस बात का अहसास तो ना हुआ
कि प्रतिबिम्ब अब टुकड़ों मे बँटा है।
डरता हूँ -
बरसात आ गयी है।
झील मे फिर पानी आ ही जाएगा।
खुद को तो अब तक समझा ना पाया
फिर झील के आंसुओं को कौन रोकेगा?
उसी झील के किनारे
जिसके प्रतिबिम्ब में
हमारी छवियाँ साथ दिखती थी।
अच्छा है - झील सूखी है।
कम से कम झील को
इस बात का अहसास तो ना हुआ
कि प्रतिबिम्ब अब टुकड़ों मे बँटा है।
डरता हूँ -
बरसात आ गयी है।
झील मे फिर पानी आ ही जाएगा।
खुद को तो अब तक समझा ना पाया
फिर झील के आंसुओं को कौन रोकेगा?

बड़ी गहरी रचना लिख गये भाई!!
nicely put...
:)
kam shabdon mein bahut kuch keh diya hai aapne nd shayad yehi kam shabd aapki kavita ko gehraayi de rahe hain... bahut hi napi tuli aur kasi hui kavita hai..... really beautiful........[:)]
thnx thanx thanks. :)
अंतिम पंक्तियों नें संवेदित कर दिया। बहुत ही अच्छी रचना।
*** राजीव रंजन प्रसाद
धन्यवाद राजीव जी!
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