अनुभव

आज अचानक बैठे बैठे सोचने लगा-

कि अनुभवी कौन है?

वे लोग,
जो मीलों अपनी लक्ष्य की तरफ दौड़ते हैं?
या वो रास्ता
जो चुपचाप थिर होके सबकी दौड़ देखता है?

कि किसका अनुभव गहरा है?

अनंत जल वाले उस सागर का
जिसमे अनगिन नदियों के पसीने हैं?
या उस बिलखती नदी का
जो पहाड़, पठार और मैदानों को नापती
शून्य से उभरकर अनंत मे विलीन हो जाती है?

कि किसके अनुभव से सीखूं?

गर्वोन्नत ग्रीवा वाले अलंघ्य हिमालय से
जहाँ शिव जैसे देवता ही वास कर सकते हैं।
या फिर उस बंजर धरती से
जो अपनी छाती पर
बेबस किसान के नुकीले हल का घाव सहलाती है
और फिर भी लहलहाती है।

कि किसका अनुगामी बनूँ?

उस वृद्ध का जिसने जीवन के सौ साल जिए हैं
या उन युवकों का
जिन्होंने बीस सालों मे
चालीस घाटों के पानी पिए हैं?

5 टिप्पणियाँ

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alok kumar said...

bahut hi mushkil prashna hai ye....??? shaayad dono or se bahut kuchh seekhne ko mil jaaye!!


Udan Tashtari said...

प्रश्न सभी उचित हैं. तलाशने पर कुछ हद तक जवाब मिल सकते हैं.

बंजर भूमि पर हरियाली का लहलहाना समझ नहीं आ पाया! बंजर तो बंजर ही है, चाहे लाख हल चलायें और अगर हरियाली लहलहा गई तो फिर काहे की बंजर.

रचना सुंदर है.


Divine India said...

रचना में दर्शन के भाव ठीक उभर कर आये हैं बहुत कुछ कहा है और बड़े सुंदर ढंग से…मगर समीर भाई की बात भी गौर करने के लायक है…।
देखना थोड़ा और स्पष्ट हो जाए॥


Reetesh Gupta said...

अच्छी रचना है ...अच्छा लगा पढ़कर ...बधाई


विकास कुमार said...

@समीर जी, divine India जी!
"या फिर उस बंजर धरती से
जो अपनी छाती पर
बेबस किसान के नुकीले हल का घाव सहलाती है
और फिर भी लहलहाती है।"
हर उपजाऊ भूमि पहले बंजर होती है और हलों के प्रहार एवं किसान के पसीने उसे उपजाऊ बना देते हैं। तो बंजर भूमि से लेकर लहलहाने तक का जो अनुभव समेता है, मैं उसका जिक्र करने कि चेष्टा कर रहा था। भाव स्पष्ट नही हुआ, क्षमाप्रार्थी हूँ।

रीतेश जी! धन्यवाद आपका!

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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