राजनीति मे हिंदी कही खो ना जाये
जिस दिन गूगल ने हिंदी मे ब्लोगिन्ग की शुरुआत की उस दिन मैं बहुत खुश हुआ। पहले यदा-कदा हिंदी लिखा करता था, सोचा अब अक्सर लिखा करूंगा। और धीरे धीरे ज्ञात हुआ कि बहुत सारे लोग हिंदी ब्लोगिन्ग से जुडे हैं। धीरे धीरे कुछ मित्र भी बने। फिर एक दिन नारद से भी जुडना हुआ।
मैं ठहरा अज्ञानी। मुझे लगता था कि हिंदी ब्लोगिन्ग का उद्देश्य हिंदी को बढावा देना है। हिंदी साहित्य के प्रति मेरी अगाध श्रध्दा, कुछ प्रतिष्ठित कुछ नवोदित लेखकों, कवियों की रचनायें पढने का लालच; मुझे उकसाता गया, उकसाता गया। परंतु अब निगाह फेरता हूँ तो पाता हूँ कि कई सम्माननीय लेखकों के बीच दुराव आ रहा है। हिंदी साहित्य केवल पत्रकारिता तो नही है ना? फिर हर कोई पत्रकार क्यों बनना चाहता है? कई जगहों पर धर्मनिरपेक्ष, साम्यवाद, लोकतंत्र और हिटलर का वर्णन सुन रहा हूँ। माना कि यह भी एक अहम हिस्सा है परंतु क्या साहित्य केवल राजनीति के बूते उंचा उठ सकता है?
अभी अभी कई ऐसे पोस्ट पढे जिससे ज्ञात हुआ कि नारद से अशिष्ट भाषा के इस्तेमाल के चलते एक ब्लोग हटा दिया गया। इस बात के पक्ष और विपक्ष मे कई लोग गरमा गरम बहस कर रहे हैं। अच्छा कर रहे हैं - तर्क तो होना ही चाहिऐ। लेकिन क्या इससे आपसी मनमुटाव नही बढ रहा???
अब यदि किसी की भाषा निंदनीय है तो उसकी निंदा कीजिये ना? उसका सिर कलम थोड़े ही कर दीजियेगा? अब कुछ लोग कुछ भी लिखने से पहले डरेंगे कि नही? अपनी बात करूं, तो मैं कभी कभी किसी ब्लोग पर जाके टिपण्णी कर दिया करता था। अब अगर मेरी कोई बात आपको अखरे और आप मेरी निंदा करें तब तक तो ठीक, लेकिन मुझे मारें पर उतारू हो जाये तो क्यों कहूँगा कुछ? कमजोर तो चुप हो ही जायेगा ना?
सारांश यह कि भाषा का सही प्रयोग हर इन्सान की नैतिक जिम्मेदारी है और जो भी नैतिकता भंग करेगा, मैं उसका विरोध तो करूंगा ही। परंतु साथ ही साथ ऎसी हर कोशिश का विरोध करना भी अनिवार्य है जो किसी की आवाज दबा दे। होना यह चाहिऐ था कि हर इन्सान जो अभद्र भाषा पढे, उसकी भर्त्सना कर दे। खुद ब खुद लेखक को सबके दिल की बात पता चल जाती। परंतु किसी की आवाज को एक मंच से हटा देने से क्या अनैतिकता की आवाज दब जायेगी? अरे! यह तो जिम्मेदारियों से भागने वाली बात हुई। रहने दीजिए उस आवाज को भी और उन्हें शिष्टता सिखायिये। अपने कान बंद कर लेने से गालियाँ खतम नही होती।
आदमी शर्म से तो शायद बदल भी जाये परंतु इस तरह के बहिष्कार से विरोध और मुखर हो उठता है यह जानने के लिए विद्वान् होने की आवश्यकता तो है नहीं। क्या होगा किसी ब्लोग को हटाने से? कुछ और लोग ब्लोग हटा लेंगे और फिर गाली गलौज के नए कीर्तिमान बनेंगे। यह सब क्या किसी भी तरह से हिंदी-सेवा होगी?
सो हे महानुभावों! इस बालक की इस 'छोटा मुह, बड़ी बात' वाली चेतावनी सुनें। मुझे डर है कि इस तरह की राजनीति मे हमारी हिंदी कहीँ खो ना जाये।
मैं ठहरा अज्ञानी। मुझे लगता था कि हिंदी ब्लोगिन्ग का उद्देश्य हिंदी को बढावा देना है। हिंदी साहित्य के प्रति मेरी अगाध श्रध्दा, कुछ प्रतिष्ठित कुछ नवोदित लेखकों, कवियों की रचनायें पढने का लालच; मुझे उकसाता गया, उकसाता गया। परंतु अब निगाह फेरता हूँ तो पाता हूँ कि कई सम्माननीय लेखकों के बीच दुराव आ रहा है। हिंदी साहित्य केवल पत्रकारिता तो नही है ना? फिर हर कोई पत्रकार क्यों बनना चाहता है? कई जगहों पर धर्मनिरपेक्ष, साम्यवाद, लोकतंत्र और हिटलर का वर्णन सुन रहा हूँ। माना कि यह भी एक अहम हिस्सा है परंतु क्या साहित्य केवल राजनीति के बूते उंचा उठ सकता है?
अभी अभी कई ऐसे पोस्ट पढे जिससे ज्ञात हुआ कि नारद से अशिष्ट भाषा के इस्तेमाल के चलते एक ब्लोग हटा दिया गया। इस बात के पक्ष और विपक्ष मे कई लोग गरमा गरम बहस कर रहे हैं। अच्छा कर रहे हैं - तर्क तो होना ही चाहिऐ। लेकिन क्या इससे आपसी मनमुटाव नही बढ रहा???
अब यदि किसी की भाषा निंदनीय है तो उसकी निंदा कीजिये ना? उसका सिर कलम थोड़े ही कर दीजियेगा? अब कुछ लोग कुछ भी लिखने से पहले डरेंगे कि नही? अपनी बात करूं, तो मैं कभी कभी किसी ब्लोग पर जाके टिपण्णी कर दिया करता था। अब अगर मेरी कोई बात आपको अखरे और आप मेरी निंदा करें तब तक तो ठीक, लेकिन मुझे मारें पर उतारू हो जाये तो क्यों कहूँगा कुछ? कमजोर तो चुप हो ही जायेगा ना?
सारांश यह कि भाषा का सही प्रयोग हर इन्सान की नैतिक जिम्मेदारी है और जो भी नैतिकता भंग करेगा, मैं उसका विरोध तो करूंगा ही। परंतु साथ ही साथ ऎसी हर कोशिश का विरोध करना भी अनिवार्य है जो किसी की आवाज दबा दे। होना यह चाहिऐ था कि हर इन्सान जो अभद्र भाषा पढे, उसकी भर्त्सना कर दे। खुद ब खुद लेखक को सबके दिल की बात पता चल जाती। परंतु किसी की आवाज को एक मंच से हटा देने से क्या अनैतिकता की आवाज दब जायेगी? अरे! यह तो जिम्मेदारियों से भागने वाली बात हुई। रहने दीजिए उस आवाज को भी और उन्हें शिष्टता सिखायिये। अपने कान बंद कर लेने से गालियाँ खतम नही होती।
आदमी शर्म से तो शायद बदल भी जाये परंतु इस तरह के बहिष्कार से विरोध और मुखर हो उठता है यह जानने के लिए विद्वान् होने की आवश्यकता तो है नहीं। क्या होगा किसी ब्लोग को हटाने से? कुछ और लोग ब्लोग हटा लेंगे और फिर गाली गलौज के नए कीर्तिमान बनेंगे। यह सब क्या किसी भी तरह से हिंदी-सेवा होगी?
सो हे महानुभावों! इस बालक की इस 'छोटा मुह, बड़ी बात' वाली चेतावनी सुनें। मुझे डर है कि इस तरह की राजनीति मे हमारी हिंदी कहीँ खो ना जाये।

सही है! यानी कि आप गांधीगिरी से लेखकीय भाषा सुधारना चाहते हैं। :)
ना जी...सुधारना नही, बचाना चाहता हूँ।
khoob, bohat umda baat kahi aapne
आपकी एक एक पंक्ति मेरे विचारों की अभिव्यक्ति है.
साधूवाद, मेरे पास शब्द नहीं थे, आपने दे दिये. अब मुझे कुछ नहीं कहना.
बहुत सही
आपकी चिंता वाजिब है।
जिस दिन गूगल ने हिंदी मे ब्लोगिन्ग की शुरुआत की
Kis din ki? Google ne Hindi blogging ki shuruaat ki yeh to aapse pata chala hei.
गहन चिंतन, बहुत खूब.
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