क्यों हो इतनी दूर?

जब बारिश के मौसम मे
अकेले भीगते भीगते
उसे मेरी याद आ जाती है
तो पुनः,
मेरी सखी
मुझसे अपनी शिक़ायत दुहराती है।

कहती है -
बारिश की बूँदें
छीन लेतीं हैं मेरा हक,
उसके चेहरे को छू कर।
कहती है -
एक बारिश
शुरू हो जाती है उसके भी अन्दर।

दिल की सारी वेदना
समेटने को
जब शब्द कम पड़ जाते हैं,
और मेघ दूत के सहारे भेजे संदेशे
जब मुझ तक पहूँचने के पहले ही
दम तोड़ जाते हैं -

तो चिल्लाती है
अकेले में कि
क्यों? आख़िर क्यों हो इतनी दूर?

और मैं -
बस इतना कह पाता हूँ -
मनुष्य हूँ,
असहाय,
मजबूर।

5 टिप्पणियाँ

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Divine India said...

बहुत सुंदर भाव हैं…काफी कसी हुई कविता है की आप लगातार पढ़ते ही जाते है…भटकने का मौका नहीं मिलता।


परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना है ।बधाई।


alok kumar said...

teri do takiya ki naukri mere laakhon ka sawan jaaye....
meghdoot ka rupaantaran lag raha hai ye..:))


crazy devil said...

good poem ..saaale itna accha kaise likhta hai


विकास कुमार said...

शुक्रिया आप सबों का।
इस तरह बढ़ाते रहे तो एक दिन ये कल्लू भी कालिदास हो जाएगा। ;)

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  • मेरे बारे में

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    विकास कुमार
    मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
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