कोई बचाओ मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से
लोग भूत-पिशाच, राजनीति, झूठ, बंदूक, जंगली जानवर, अँधेरे और ना जाने किस किस चीज से डरते हैं। कुत्ते के काटे लोग तो पानी से भी डरने लगते हैं और उसके लिए एक सुंदर नाम भी है 'हाइड्रोफोबिया'। 'अब्लुटोफोबिया' से लेकर 'जूफोबिया' तक की लिस्ट तो यहीं देखने को मिल जायेगी। अब चुंकि हम हिंदी को बढावा देने की चेष्टा कर रहे हैं तो 'अन्ग्रेजोफोबिया', 'झूठोफोबिया', 'अन्धेरोफोबिया' जैसे शब्द भी प्रयोग मे ला ही सकते हैं। परंतु मेरे मन का दर इन सारे फोबियाओं से बिल्कुल अलग है। कम से कम आंग्ल भाषा में और डाक्टरों के शब्दकोष में तो इसके लिए कोई शब्द नही है।
हंसना मना नहीं है, सो जी आये तो दिल खोल के हँस लीजिये। पर मेरी समस्या सचमुच अजीब है, जिसे मैं टिप्पणीओफोबिया कहूँगा। समझ तो आप गए ही हैं कि मेरी समस्या क्या है? कहीँ भी टिप्पणी करने से डरता हूँ मैं। कारण- अधिकांश ब्लागरों से उम्र मे छोटा हूँ। अब बडों पर टिप्पणी करना तो अशिष्टता होगी ना? और अगर ना करूं तो उन लोगों के साथ तो अन्याय होगा जो निरंतर आकर मेरा मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन करते हैं। आगे कुँआ पीछे खाई वाली स्थिति है। बिल्कुल त्रिशंकु बन गया हूँ। साहस करके कहीँ कहीँ टिपियाने कि चेष्टा करता भी हूँ तो शब्द चयन कि समस्या विकट हो जाती है। कभी कभी 'छोटा मुँह बड़ी बात' करने का डर तो कभी 'सूरज को दिया दिखाने' का भय हमेशा मन मे समाया रहता है। अब महान लेखकों को मेरे जैसा अनाड़ी 'अच्छा है, बधाई या लिखते रहें' भी तो नही लिख सकता। कल्लू को कालिदास की कृति भा भी गयी तो उसे टिप्पणी करने का अधिकार तो नही मिल जाता ना???
बडे संशय मे हूँ। कोई मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से बचने का मार्ग दिखाएँ तो जान बचे।
हंसना मना नहीं है, सो जी आये तो दिल खोल के हँस लीजिये। पर मेरी समस्या सचमुच अजीब है, जिसे मैं टिप्पणीओफोबिया कहूँगा। समझ तो आप गए ही हैं कि मेरी समस्या क्या है? कहीँ भी टिप्पणी करने से डरता हूँ मैं। कारण- अधिकांश ब्लागरों से उम्र मे छोटा हूँ। अब बडों पर टिप्पणी करना तो अशिष्टता होगी ना? और अगर ना करूं तो उन लोगों के साथ तो अन्याय होगा जो निरंतर आकर मेरा मार्गदर्शन एवं उत्साहवर्धन करते हैं। आगे कुँआ पीछे खाई वाली स्थिति है। बिल्कुल त्रिशंकु बन गया हूँ। साहस करके कहीँ कहीँ टिपियाने कि चेष्टा करता भी हूँ तो शब्द चयन कि समस्या विकट हो जाती है। कभी कभी 'छोटा मुँह बड़ी बात' करने का डर तो कभी 'सूरज को दिया दिखाने' का भय हमेशा मन मे समाया रहता है। अब महान लेखकों को मेरे जैसा अनाड़ी 'अच्छा है, बधाई या लिखते रहें' भी तो नही लिख सकता। कल्लू को कालिदास की कृति भा भी गयी तो उसे टिप्पणी करने का अधिकार तो नही मिल जाता ना???
बडे संशय मे हूँ। कोई मुझे इस टिप्पणीओफोबिया से बचने का मार्ग दिखाएँ तो जान बचे।

I also have the same phobia. u r not alone :-)
एक दो टिप्पणी दोगे तो सारा फोफिया उड़न-छू हो जाएगा. चाहो तो हमारे ब्लोग पर अभ्यास कर सकते हो. आपकी किसी बात का बुरा नहीं माना जायेगा :)
www.tarakash.com/joglikhi
@ओझा जी
तब तो आप मेरे इस पोस्ट को बुकमार्क कर लें। और यदा कदा आते रहें...शायद किन्ही सज्जन का सुझाव आपको भी भा जाये। हम कम-उम्र लोगों का ये 'कॉमन प्रॉब्लम' है :डी
@संजय जी
आपके ब्लोग पे तो मैं लगभग रोज ही आता जाता रहता हूँ। शायद एक दो बार टिपियाया भी है। लेकिन उससे फोबिया कोई उड़न-छू थोड़े ही होता है। डरते डरते ही सही रोज १०-१५ जगह टिपिया आता हूँ। हमें तो कोई फुल प्रूफ़ सुझाव दिया जाये।
मैं भी छोटा हु। कई लोग तो कह चुके हैं कि आप तो बडे युवा हैं। लेकिन कमाल का लिखते हैं। मुझे ऐसा नही लगता, भले ही वो हौसला अफजाई के लिए ही लिखते हो। वैसे ये बता दु कि आप ने बड़ा अच्छा लिखा है । ये फोबिया-मनिया को दूर हटाइये और कमेंट कीजिये।
भैया ई फोबिया-ओबिया को साईड करो और टिपियाते रहो बस
विकास देखा, सलाह मांगो तो कित्ते हाजिर हो जाते हैं!
हमारी सलाह है कि कोई ऊटपंटाग नाम रख लो (हमारे जैसा). और मजे में लोगो के ब्लागों पर टिपियाते फिरो. जब कलेजा मजबूत हो जाये तब फिर विकास के नाम से आ जाना
हे भगवान, संजय जी को कहते हो कि डरते डरते 10-15 जगह टिपिया आते हो और बोलते हो कि टिपियाते में डरते हो?
जब डर भावना से 10-15 जगह टिपिया डालते हो, न डरोगे तो कित्ता टिपियाओगे?
देखिए आप एक काम करिए, हमारे ब्लॉग पर निश्चिंत होकर टिप्पणियाँ किया कीजिए। हम कतई बुरा नहीं मानेंगे। आप पुरानी सारी पोस्टें निकाल कर टिप्पियाइए।
लिंक यह रहा: ई-पंडित
अजी "हम भी हैं लाईन में" ..
आओ आओ ना घबराओ..
हाथ खोल के हाथ दिखाओ
टिपियासा के मारे हम भी
थोड़ा आके तुम टिपियाओ
वैसे आप युवा हैं ..मैं तो अभी बच्चा ही हूं :-)
विकास एवं ओझा जी
इन सारे लोगों के चक्कर में मत आओ.हमारा तो सब जानते हैं कि हम बुरा नहीं मानते. और दो दो तीन तीन क्या होता है जब तक पूरा भय न निकल जाये और निकलने के बाद भी लौट कर न आ क जाये तो जारी रखो टिप्पणियां हमारे ब्लॉग पर.
शुभकामनाऐं कि आपका डर बना रहे.
अरे लगता है तुमने अभी तक समीरजी (उडनतश्तरी) की टिप्पणी वाली पोस्ट नहीं पढी जिसमें उन्होने टिप्पणी लिखने के गुर सिखाये हैं । उदाहरण के तौर पर:
ऐसा ही लिखते रहें, बहुत अच्छा,
मनोभावों को खूब उकेरा है, साधुवाद स्वीकार करें,
एक निष्पक्ष लेख लिखने के लिये धन्यवाद,
सच में एक विचारोत्तेजक लेख,
भावनाओं की जद्दोजहद साफ़ दिखायी दे रही है,
बडे समय के बाद एक तथ्यपरक और सन्तुलित लेख,
कुछ पंक्तियां पोस्ट से टीप लेने के बाद लिखें,
इन पंक्तियों ने मन को छू लिया...
और भी बहुत कुछ लिख सकते हैं टिप्पणियों में, बस लिखते रहें ।
LOLz
Benaam!!!
LMAO ROTF =))
dekho vikash
kahte kahte ya fir haste haste bahut commenting kar li :D
राजेश जी, मैं बड़ा भी नही हूँ और युवा भी नहीं। अभी तो मुझे बचपन के मजे लूट लेने दीजिए। अभी तो कानूनन शादी की उम्र बही नही हुई है मेरी। ;)
देखिए धुरविरोधी जी....डरते हैं इसलिये १०-१५ ही होता है। नहीं तो जहाँ भी जाते, हमे ही पाते।
श्रीश जी, काकेश जी और समीर जी यहाँ तो मैं पहले से ही बेधड़क टिपिया आता हूँ। तो वहाँ तो कोई टेंशन है ही नही।
और बेनाम महोदय...! आपको तीन टिप्पणी लिखने का वक़्त यदि है, तो अपना नाम लिखने मे क्या हर्ज है। ऐसा गुप्त दान काहे कर रहे हैं...???
yahi samasya mujhe aappar tippani karte waqt ho jaati hai :((
डरो नही आलोक। टिपण्णी ना करो तब डरना। मेरे ब्लोग पर जब तक टिपियाते रहोगे, तब तक तुम्हारी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी रहेगी।
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