आज तुम चुप बैठो

रे सखि! आज तुम चुप बैठो, इस पागल मन को कहने दो।
उमड़ रहे जो भाव, उन्हें मत रोको, उनको बहने दो।

यह भावों का खेल सखे, शब्दों में उलझ ना जाना तुम
जब चाहे पास बुला लेना, जब चाहे दूर भगाना तुम
जब रात घिरी अँधेरी हो, उनींदी अँखियाँ मेरी हो
उस रात मगर मेरे प्रीतम! सपनों में ही आ जाना तुम

माना कि सपने भंगुर हैं, पर थोड़ी देर तो रहने दो।
रे सखि! आज तुम चुप बैठो, इस पागल मन को कहने दो।

मेरी कर्कश आवाज को सुन, ये चांद भले घबरा जाये
मेरे अंतर के कालिख से, ये रात भले घहरा जाये
पर ओ प्रीतम! तुम सुन लेना, उनमे से खुशियाँ चुन लेना
जाने मैं वाणी कब खो दूं, नियति जिह्वा ठहरा जाये

शब्द भी मेरे विह्वल हैं, उनको भी पीड़ा सहने दो।
रे सखि! आज तुम चुप बैठो, इस पागल मन को कहने दो।
मेरी आवाज में इस कविता का वाचन यहाँ सुनें।

4 टिप्पणियाँ

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prabhakar said...

मज़ा आ गया विकाश जी
कविता में भी और आपकी पहल देखकर भी
बहुत कम लोग नेतरहाट के बाद हिन्दी से जुडे रह पातें हैं!


विकास कुमार said...

अरे भाई! वह प्रेम ही कैसा जो कुछ ही वर्षों में खत्म हो जाये. :)


Surbhi said...

kavita bahut hi sundar hai. bhav avam bhasha dono main achchi lay bhi hai


विकास कुमार said...

dhanyawaad surabhi ji. :)

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