और ना ही नफ़रत है तुम्हारे लगाव से.
और ना ही गुस्सा हूँ तुम पर, तुम्हारे चुनाव से.
लेकिन मैं ये पेड़-पौधे, ये दूब, ये कांटे नहीं छोड़ पाऊँगा
जो कुछ जन्म से मेरा है, प्राकृतिक है
वो जमीनी बंधन ’मैं’ नहीं तोड़ पाऊँगा.
मेरी भावात्मक जड़ता मुझे उतनी ही प्रिय है -
जितना मेरा निजत्व
और मैं स्वयं से मुँह नहीं मोड़ पाऊँगा.
सो मुझे इस गाँव की कच्ची गलियों में अज्ञातवास करने दो
’आज मेरे घर पानी नहीं आया’,
’रात में बिजली आँखमिचौली खेलती रही’,
’कल फिर मेरा खाना जल गया’ -
रूपी समस्यायें मुझे खुद से जोड़े रखती है ,
ये मैं तुम्हें समझाऊँ भी तो क्या समझोगे?
मेरी जली हुई ’मैगी’ तुम्हारे फ़ाइव स्टार के ’पास्ता’ से
हमेशा जीत जाती है – इसमें समझने योग्य कुछ है भी तो नहीं.