Tuesday, January 17, 2012

अंतर

कुछ कवितायें – जिनपर तुम तालियाँ बजाते हो
को मैं गालियाँ देने की हद तक भी पसंद नहीं करता.
और कुछ पंक्तियाँ -
जिन्हें तुम कविता मानने से भी इनकार करते हो
को पढ़ते पढ़ते
सिहर जाता है मेरा रोम रोम.

ठीक ही है ना?
आखिर मेरी और तुम्हारी उम्मीदें,
और कविता के प्रति मोह अलग अलग है.
मेरी समझ उतनी प्रबुद्ध नहीं -
कि मैं इंटेलेक्चुयल गिना जाऊं.

मेरी छोटी सी समझ में
एक समग्र विचार अट ही नहीं सकता.
एक परिपूर्ण इतिहास, एक बौद्धिक चेतना की तो बिलकुल जगह नहीं
(समय भी नहीं उतना)

सो, मैं एक छोटे शहर से निकल के
एक बड़े शहर में आने वाली -
तुम्हारे पैमानों से अनुभवहीन -
एक छोटी लड़की की
बड़ी कवितायें पढ़ के सिहर उठता हूँ.

सुन रहे हो तो कह दूं
कि मुझे फर्क नहीं पड़ता -
और लड़कियों कि कवितायों को
‘लाईक’ करने में शर्म महसूस नहीं होती.
एक दिन तुम्हे भी पसंद कर लूं शायद -
जब तुम पूर्वाग्रह से परे होकर – समझ सको -
कि अनुभव का उम्र से कोई वास्ता नहीं.

Saturday, January 07, 2012

एपेटाईट

मैं ग़रीब हूँ
मेरी एपेटाईट बहुत कम है.

छोटी सी ख़ुशी से खुश हो लेता हूँ
छोटी सी बात पे भी रो लेता हूँ
जहाँ होता हूँ, सो लेता हूँ.
चुग लेता हूँ कुछ भी, कहीं भी
मर सकता हूँ, अब भी, यहीं भी
कयोंकि सपनों की लीज़ अब ख़तम है.

खुशहाली के चमत्कार से वास्ता नहीं
गिरते बाज़ार से वास्ता नहीं
तीज ओ त्यौहार से वास्ता नहीं.
समाजी पैमाने पे निरर्थक हूँ
स्वार्थी बने रहने का समर्थक हूँ .
सर उठाये रखने तक कंधे में दम है
आँखों में शरम है
गुस्सा थोडा ज्यादा है
पर एपेटाईट बहुत कम है.

Thursday, November 24, 2011

कौन बुरा था कौन भला?

जब जब भी तुम कहते थे और हम चुप चुप से रहते थे
और इतना इतना हँसते थे कि आँख से आंसू बहते थे.
जब तेरी मेरी आँखों में, बस एक से सपने पलते थे
हम अपनी धुन में जीते थे और जलने वाले जलते थे.

उन लम्हों की यादों से जो एक बूँद आंसू निकला
तब हम तुमसे पूछेंगे कि कौन बुरा था कौन भला.

झील किनारे, खिले सितारे, टुक टुक बैठे तुम्हे निहारे
आँखों ही आँखों में खेलें, हम तुम कितने खेल न्यारे.
मैं जीतूँ तब भी तुम जीतो, तुम जीतो तब भी हम हारे
जीत तुम्हारी, खेल तुम्हारा, मैं भी तेरा साथ तुम्हारे.

उन शामों का सूरज, तेरी नजरों में जो कभी ढला
तब हम तुमसे पूछेंगे कि कौन बुरा था कौन भला.