झील वाली कहानी

पहले तो वह उसे चोरी से देखता रहा. सावधानी से. ऐसे जैसे उसकी देह को उसके नजरों की छुअन महसूस ही ना हो. फिर धीरे धीरे ढीठ सा हो गया. अब वह सामने पड़ी झील में चीड़ों की परछाई नहीं देख रहा था. वो सुंदर थी. ढलते सूरज की चमक उसके कंधे से झूल रही थी. जनवरी की छरहरी हवा उसके बालों को जब भी हिलोरती, उसके लम्बे कान साफ़ नजर आते. कोई बाली नहीं, सिर्फ़ कान.

चुप रहना अब मुश्किल हो गया था. दूर बैठे रहना और भी मुश्किल. लेकिन उस छोटी सी पगडंडी को पार करके उस लड़की तक पहुँचने का कोई बहाना उसे सूझ नहीं रहा था. सिगरेट की तलब भी महसूस होने लगी थी. अगल बगल लोग थे. रोज की तरह कोलाहल भी था ही. मगर आज उसका चित्त एकाग्र था. डाक्टर की सलाह मानकर वो पिछले तीन महीनों से यहाँ रोज आ रहा था लेकिन तबीयत में आज जैसा कोई फर्क आज तक नहीं आया. अब तक उसने उसका चेहरा नहीं देखा था. पर कुछ लोग होते हैं जिनके होने का अहसास ही बहुत सुंदर होता है. अनजान खयालों में खोयी वो अनजानी लड़की कुछ ऐसी ही थी.

वो हिम्मत करके उठा. पाँच गज की पगडंडी पार करने में उसके पाँच से ज्यादा मिनट खर्च हो गये.चुप्पी साधे लहरें उसे देख रहीं थी.

"सुंदर सी जगह है ना?

अपनी खरखराती आवाज सुनकर उसे थोड़ा डर लगा. मौसम की सर्दी आवाज में उलझ गयी थी. लड़की थोड़ा अचकचा गयी. एक क्षण को उसे यकीन भी नहीं हुआ कि ये बात उससे कही गयी है. उत्तर में सिर्फ़ मुस्कुरा कर रह गयी. एक बार की मुस्कुराहट ने लड़के का भय थोड़ा कम किया.

"ये झील बारिश के समय में देखने लायक होती है.
"ये झील इस वक्त भी देखने लायक है.

इस बार झील ने लड़की को भी सुना. आवाज अपने घर के किसी अजनबी कोने से आती हुई लगी. शीशे पर रेत के गिरने सी मद्धम आवाज. लड़का कुछ देर उस आवाज के साथ साथ घर के उस कोने में जा बैठा जो बचपन में बिलकुल अपना सा था और जिस कोने की ओर नजरें उठाये सालों हो गये थे. कैसे कुछ लोग अचानक आपको एक अलग ही देश-काल में धकेलने की ताकत रखते हैं - का विचार थोड़ी देर लड़के के दिमाग में चलता रहा. दो संवादों के बीच में मौन की लंबी दूरी ना आये की हड़बड़ाहट में लड़के ने जल्दी से पूछ लिया.

"आप यहाँ पहली बार आयी हैं?

बोलने के बाद उसे झट से महसूस हुआ कि शायद जल्दबाजी हो गयी. कहीं वो ये ना समझ ले कि मैं उसकी बात सुनने से ज्यादा अपने सवाल पूछने को तवज्जो दे रहा हूँ. लड़की एक बार फिर मुस्कुरायी. ये मुस्कुराहट पिछली मुस्कुराहट से थोड़ी अलग थी. इस मुस्कुराहट के बाद एक अनकहा सा पूर्णविराम था. वो दूर देखने लगी. अपनी आँखों और आकाश के बीच का कोई बिन्दु. लड़का समझ गया कि उसका प्रश्न किसी और प्रश्न के उत्तर के साथ घुल गया है. हवा ने फिर से लड़की के बाल कंधो से उठा फेंके. कोई बाली नहीं, सिर्फ़ कान.

(जारी…)

तो मैं भी

कलम उठाने से कवितायें लिखी जा सकती
या फिर पैदा किये जा सकते विचार
या लहलहायी जा सकती एक क्रांति
या फिर सहेजा जा सकता कोई चिंतन
- तो उठा लेता मैं भी.

बस कह भर देने से आ सकता परिवर्तन
या उड़ेली जा सकती समझ
या बाँटी जा सकती संवेदना
या साबित किया जा सकता प्रेम
- तो कह देता मैं भी.

यदि सो जाने से संजोये जा सकते स्वप्न
या धकेली जा सकती चिंतायें
या रोकी जा सकती भटकन
या मिल सकती जीवन ऊर्जा
- तो सो जाता मैं भी.

उसका सोचना

बहुत दिन हुए उसे कुछ भी लिखे हुए। ऐसा नही था कि उसके दिमाग में हमेशा उठती रहने वाली कुलबुलाहट बंद हो गई थी। ऐसा भी नहीं था कि उसका मन उचट गया था, लिखते रहने से। सब कुछ पहले जैसा ही था - एग्जैक्ट्ली सेम। उसने बहुत बार कोशिश की थी कुछ लिखने की। कई बार लिखा भी -लेकिन इससे पहले की शब्दों का संसार सजता - उसे मिटा देता। जो कुछ भी लिखा था, जो कुछ भी लिखने जाता था- सब महत्वहीन लगने लगे थे। जीवन इन सब उटपटांग कविताओं और प्रेम के पैगामों से कुछ अधिक सा है, वो हमेशा से जानता था। लेकिन उसकी इस जानकारी ने उसके दिमाग पे इस बेचैनी से कभी दस्तक नहीं दी। हर बीतता वक्त हमें कुछ पीछे ना छोड़ दे - के डर से वो हर वक़्त भरा होता। लाइफ इज वैरी फास्ट दीज डेज़इफ यु स्टाप फॉर मोमेंट, यु विल बी लेफ्ट अलोन

वो औरों जैसी जिंदगी नहीं जीना चाहता था। लेकिन औरों की जिंदगी के अलावा उसने कोई और जिंदगी देखी भी नहीं थी। शायद इसलिए उसका हर लिखना, उसे किसी के निजी जीवन की चोरी सा लगने लगा था। अनुभव के नाम पर उसके पास, लेखकों में जिनती उम्र होनी चाहिए उतनी किसी तरीके से नहीं थी। वो लिखने के अलावा कभी कभी पढा भी करता था।परन्तु जितने सम्माननीय लेखक थे - वो उन सा नहीं होना चाहता था। और वो जिन सा होना चाहता था उनमे से कोई भी 'सम्मानित' लेखक नहीं था। सो कभी कभी उसे इस लेखन के धंधे से चिढ भी मचती थी। 'धंधा' - राइटिंग, एंड ऑल आर्ट्स फॉर दैट सेक - इज गौड डैम बिजिनेस नाउ

उसे कला के पतन पर ज्यादा दुःख था या अपनी सामयिक कलाहीनता पे - इसका उसे ठीक ठीक पता कभी नहीं चलता था। इस बारे में सोचने से ही उसका सर गर्म हो जाता था। लुक एट दी प्रीवियस जेनरेशनदे वर मोर कंसर्न्ड अबाउट आर्ट एंड ऑल। लेकिन हम लोग सिर्फ़ ऊंची बिल्डिंग और महंगी कारें ही जानते हैं। कुछ खिलाड़ियों को ही देश का आइकन बना दिया गया है। एक कलाकार काम भी करे तो क्या इन पागलों के लिए करे?

वैसे भी कोई पेंटर नही दिखता। पेंटिंग का शौक लिए बहुत लोग दिखते हैं लेकिन कोई पेंटर नहीं दीखता। पेंटर होना - कुछ ना होने की निशानी है। उसी तरह लेखक या कवि होना भी है। आप इनका शौक पाल सकते हैं। पर ये शौक कभी आपको नहीं पालते। कम से कम इस देश में तो नहीं ही पालेंगे। क्यूँ? ऐसा क्यूँ हो गया है? कहाँ गलती हो गई है? ये देश तो बहुत महान हुआ करता था न? कितनी कलाओं ने यहाँ जन्म पाया है? जन्म देने के बाद पालने की जिम्मेवारी क्या किसी और की होती है? योग योगा ना बना होता तो क्या अब तक खो ना चुका होता? गणेश को भी स्वीकृति मिल सके के लिए गणेशा का अवतार क्यूँ लेना होता है? सुरज अब क्या पश्चिम से उगेगा? हमारी गली में भी?

वो अक्सर सोचता रहता था कि कहीं तो गलती हुई है। किसी से तो हुई है। एक पूरे समाज से एक साथ एक वक्त पर एक ही गलती का हो जाना उसे बड़ा अजीब लगा करता। इस गलती की जड़ ढूँढने में समय बिताने में उसका बहुत समय बीत जाता था। दिस वर्क इस फार मोर इंम्पौर्टेंट फॉर मी दैन राइटिंग. उसे अच्छी तरह पता था कि इस सोच का कोई नतीजा नहीं होगा। लेकिन उसे इस बात का विश्वास था कि थोडा वक्त इस सोच में बिताने से शायद उसके सोचने के तरीके में कोई तब्दीली आ जाए। देन आई कैन राइट बेटर

सोचते सोचते उसे अक्सर नींद आने लगती। नींद में उसे पुस्तकालय दीखते। ठीक वैसे ही जैसे बचपन में हर मुहल्ले में दिखा करता था। उसमे किताबें दिखतीं। रसियन, अंग्रेजी और फ्रेंच किताबों के हिन्दी अनुवाद और साथ में हिन्दी की कई किताबें। ढेर सारी किताबें। और कहीं किसी कोने में एक किताब पर उसे उसका नाम भी दिखता। फिर डरकर उसकी आँख खुल जाती। कब होगा ऐसा? कब हिन्दी में लिखी जाने वाली किताबों को भी पाठक मिलेगा। कब हिन्दी के 'धंधे' को 'बाजार' मिलेगा? आजकल उसके दिमाग में एक और खतरनाक बात चल रही थी। शुड आई साइलेंटली स्विच टु इंग्लिशआफ्टर ऑल माई इंग्लिश इज ऑल्सो प्रेट्टी गुड

top